2000 से पहले जन्म वाले जरुर पढ़े बहुत अच्छी फीलिंग आयेगी ☺ . हम लोग, जो 1947 से 2000 के बीच जन्में है,तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है, और तू मेरे गांव को गँवार कहता है // ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है // तू चुल्लू भर पानी को भी वाटर पार्क कहता है

2000 से पहले जन्म वाले जरुर पढ़े
बहुत अच्छी फीलिंग आयेगी  ☺
.
हम लोग,
जो 1947  से  2000
 के बीच जन्में  है,
 We are blessed because,

       

👍     हमें कभी भी

👌हमारें माता- पिता को
 हमारी पढाई को लेकर
कभी अपने programs
आगे पीछे नही करने पड़ते थे...!

👍    स्कूल के बाद हम
देर सूरज डूबने तक खेलते थे  

👍    हम अपने
real दोस्तों के साथ खेलते थे;
net फ्रेंड्स के साथ नही ।

👍     जब भी हम प्यासे होते थे
तो नल से पानी पीना
safe होता था और
हमने कभी mineral water bottle को नही ढूँढा ।

👍     हम कभी भी चार लोग
गन्ने का जूस उसी गिलास से ही
पी करके भी बीमार नही पड़े ।

👍     हम एक प्लेट मिठाई
और चावल रोज़ खाकर भी
बीमार  नही हुए ।

👍     नंगे पैर घूमने के बाद भी
 हमारे पैरों को कुछ नही होता था ।

👍     हमें healthy रहने
के लिए  Supplements नही
लेने पड़ते थे ।

👍     हम कभी कभी अपने खिलोने
खुद बना कर भी खेलते थे ।

👍     हम ज्यादातर अपने parents के साथ या  grand- parents के पास ही रहे ।

👌हम अक्सर 4/6 भाई बहन
एक जैसे कपड़े पहनना
शान समझते थे.....
common. वाली नही
एकतावाली  feelings ...
enjoy करते थे

👍     हमारे पास
न तो Mobile,  DVD's,
PlayStation, Xboxes,
PC, Internet, chatting,
क्योंकि
हमारे पास real दोस्त थे ।

👍     हम दोस्तों के घर
 बिना बताये जाकर
मजे करते थे और
उनके साथ खाने के
मजे लेते थे।
कभी उन्हें कॉल करके
appointment नही लेना पड़ा ।

👍     हम एक अदभुत और
सबसे समझदार पीढ़ी है क्योंकि
हम अंतिम पीढ़ी हैं जो की
अपने parents की सुनते हैं...
और
साथ ही पहली पीढ़ी
जो की
अपने बच्चों की सुनते हैं ।

We are not special,
but.
We are
LIMITED EDITION
and we are enjoying the
Generation                   Gap......

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तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है,
और तू मेरे गांव को गँवार कहता है   //

ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है  //
तू चुल्लू भर पानी को भी वाटर पार्क कहता है  //

थक  गया है हर शख़्स काम करते करते  //
तू इसे अमीरी का बाज़ार कहता है।

गांव  चलो वक्त ही वक्त  है सबके पास  !!
तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है //

मौन  होकर फोन पर रिश्ते निभाए जा रहे हैं  //
तू इस मशीनी दौर  को परिवार कहता है //

जिनकी सेवा में खपा  देते थे जीवन सारा,
तू उन माँ बाप  को अब भार कहता है  //

वो मिलने आते थे तो कलेजा साथ लाते थे,
तू दस्तूर  निभाने को रिश्तेदार कहता है //

बड़े-बड़े मसले हल करती थी पंचायतें //
तु  अंधी भ्रष्ट दलीलों को दरबार  कहता है //

बैठ जाते थे अपने पराये सब बैलगाडी में  //
पूरा परिवार  भी न बैठ पाये उसे तू कार कहता है  //

अब बच्चे भी बड़ों का अदब भूल बैठे हैं //
तू इस नये दौर  को संस्कार कहता है  .//

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