कितने अछे थे ओ दिन बचपन के पुराने लोगोके कितना बदल गया है आज के जबाने से पहले खेल लिया करते थे मैदानों में रहते थे हमारे सरीर फुर्तीला नहीं डरते थे कमो से .आज के जबाने में कोई भी खेल खेल लेते है स्मार्ट मोबाइल में नहीं .लेकिन ये भूल गए की हम स्मार्ट बना रहे है मोबाइल को .आवर बुला रहे बीमारी को आवर पूरा पढ़े बचपन के दिनों के बारे में .....


आज के जबाने में खेलने का इकलौता 'मैदान' बन गया है मोबाइल जहा स्मार्ट मोबाईल हो रहा है वही हम मुर्ख बन रहे है आज के जबाने में ...

उस अनजानी बस्ती को मैं भूल ही जाता, अगर अचानक वहां कुछ बच्चे मुझे आइस-पाइस खेलते नजर न आ जाते। वे दौड़ रहे थे, अपने साथियों को खोज रहे थे और उनके मिल जाने पर चिल्ला रहे थे। उनकी खुशी, उत्साह और निर्दोष बालपन देख कर अच्छा तो लग ही रहा था, मुझे अपने बचपन के दिन भी याद आने लगे थे। कैसे उजले दिन थे वे, जब हम कभी पिट्ठू खेलते तो कभी स्टापू। कभी रस्सी कूदते तो कभी गुल्ली-डंडा में हाथ आजमाते। कभी खो-खो खेलते तो कभी चोर-पुलिस। कभी किसी पुराने पड़ गए मोजे के भीतर पुराने कपड़े भरकर सी लेते और ऐसी बॉल अपने लिए बना लेते जो लुंज-पुंज भले हो जाए, पर कभी टूटे-फूटे नहीं। उससे हम दो तरह का काम लेते। एक तो जिसके हाथ में बॉल रहती वह किसी भी साथी को निशाना बना कर उस पर बॉल दे मारता। ऐसे में यह निशाना बनने वाले का काम होता कि वह कैसे उसकी मार खाने से बचे। अक्सर बॉल ऐसे मारी जाती कि पीठ पर जाकर जोर से लगे। दूसरे हम उससे क्रिकेट खेलते।
उन दिनों अक्सर हमारा बैट कपड़े धोने वाली थापी ही होती। हम घंटों खेलते ही रह जाते। ऐसे में समय कब फुर्र हो जाता, कुछ पता ही न चलता। जब कभी अकेले पड़ जाते और कोई खेल न सूझता, तो पत्थर मार कर कच्ची नाशपातियों या बादामों पर निशाना साधते।games घर लौटने का समय तभी होता जब अंधेरा घिर आता। लेकिन आजकल ज्यादातर बच्चों के हाथ में मोबाइल नजर आते हैं और आंखें उन पर ऐसी गड़ी हुई कि जरा इधर-उधर देखा तो गजब हो जाएगा। वे कोई मैदानी खेल भी खेलते हैं तो मोबाइल पर ही। कई दूसरे खेल तो उनके लिए इस खिलौने में मौजूद रहते ही हैं जो उन्हें अपने आप में बहादुरी का बोध कराते रहते हैं। वे बैठे-बैठे युद्ध कर लेते हैं। एक मामूली फिंगर टच से पेड़ काट डालते हैं। पहाड़ लांघ जाते हैं। राक्षसों को मार गिराते हैं। गाड़ी ऐसे दौड़ाते हैं कि खुद हैरान रह जाएं। वे आभासी स्कोर पर ही उल्लसित होते हैं और उसी पर निराश या हताश भी हो जाते हैं। परेशान करने वाली बात यह है कि जरा-से शारीरिक श्रम की नौबत आने पर वे थक कर बैठ जाते हैं।

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